रेत हो गए लोग ...

रेत हो गए लोग ...
रवि प्रकाश

Tuesday, January 11, 2011

ज्वालामुखी के मुहाने पर

गए साल की तरह आने वाले साल में भी....
मृत्यु जीवन पर भारी होगी,
क्योंकि,जीवित हैं अभी दंगों के ब्यापारी
किसानो की आंत अभी गिरवी है साहूकार की दुकान पर,
जिसकी रिहाई की शर्त जिस किताब में दर्ज है उसे रखना अब जुर्म है
और उधर जंगलों में छलनी है धरती का सीना
जिसे हत्यारे अपनी मुट्ठी में कैद रखना चाहते है!
जीवित हैं वे सभी जो मेरे देश को मौत का पिरामिड बनाकर
बिना सुबूत जेल में भर दे रहें हैं
इसी आने वाले समय(साल)में निमंत्रण है आप का,
रखी है चाय की केतली अभी भी
'ज्वालामुखी के मुहाने पर
'

Thursday, January 6, 2011

बसंत आने को है....

दुनिया भर में उठ रहे
तमाम विद्रोहों के बीच
अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाते हुए
हम बैठे हुए हैं विश्वविद्यालय
की सीढियों पर
पोस्टरों के साथ !
जिनकी जबान हम बोल रहे हैं ,
जो चले आये है दुनिया भर में पसरे
लोकतंत्र के रेगिस्तान से !
जिनका कहना है कि
अब वहाँ सिर्फ कैक्टस ही उग सकते हैं
हमारी जगह अब वहाँ बाकी नहीं है !
तो हवाएं बहुत तेज़ हैं,
पत्तियां झड चुकी हैं,
और धूप सीधी आ रही है
लेकिन परछाइयों में कहीं ना कहीं
शाखों का हस्तछेप बरक़रार है
और शाख के हर कोने से
हरा विद्रोह पनप रहा है
कि बसंत आने को है!
ये कैक्टसों की दुनिया को खुलेयाम चुनौती है
कि बसंत आने को है!
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