रेत हो गए लोग ...

रेत हो गए लोग ...
रवि प्रकाश

Saturday, May 21, 2011

कि ये आवाज़ मेरे लिए है

मैं कैसे समझूं
ये आवाज़ मेरे लिये है
जबकि एक आहत आवाज़
मेरे सामने गिरकर
छटपटाती रहती है !
मेरी आँख ,जैसे बबूल की छाल
जिसमे तैरता है
तुम्हारा चेहरा
हिलता, कोतड्डों में गुम होता हुआ
मेरा ह्रदय
जो दबा रहता है
एक पत्थर के नीचे युगों से
मुक्त होना चाहता है
एक मुल्क की तरह
संगीनो ,क्रूर आँखों
और कटीले तारों से जूझता हुआ
जिस पर एक कोयल बैठी है
वो मेरे जख्मों का गीत गाती है
सरहद के पार
और मुझे राष्ट्रगीतों की धुन पर
नाचने को कहा जाता है
रेत और रक्त से सरहदों पर
उलझा मेरा ह्रदय ,तुम्हे छूना चाहता है
एक साबुत अखंड सौंदर्य
जो अब तक कहवाघरों की
दीवारों से लड़कर लौट आती है
एक विस्थापित घूंट, जो सदियों से
गले के नीचे जा रही है
मैं वापस लौट रहा हूँ
आवाज़ और शब्दों में
प्रेम और एक मुल्क तलाशता हुआ
इसे बाँधो मत ,इसे खोल दो
जिसकी ठंडी रेत पर मैं खेलता हूँ
एक काली लंबी घनी रात है यह
जो आँखों में समाकर बंद हो जाती है
और अवाक् से होठ
एक लकीर की तरह, मेरी कहानी पर
एक टुकड़ा मुल्क रख जाते हैं
मैं तुम्हारे चेहरे पर ही विस्थापित हो जाता हूँ
उन्माद को दबाए हुए
 कि कैसे समझूं  ये आवाज़ मेरे लिए  है







 

सूर्य के हाथ से छूट रही है पृथ्वी

तुम पास बैठकर
कविता की कोई ऐसी पंक्ति गाओ
जहाँ मेरे कवि की आत्मा
निर्वस्त्र होकर
मेरे आँख का पानी मांग रही है
ये कैसा समय है
कि, ये पूरी सुबह
किसी बंजारे के गीत की तरह
धीरे-धीरे मेरी आत्मा को चीर रही है
जिसके रक्त से लाल हो जाता है आसमान
जिसके स्वाद से जवान होता है
हमारे समय का सूरज
और चमकता है माथे पर
जहाँ से टपकी पसीने की एक बूंद
जाती है मेरे नाभी तक
और विषाक्त कर देती है
मेरी समस्त कुंडलनियों को
मैं धीरे-धीरे छूटने लगता हूँ
ऐसे, कि जैसे
सूर्य के हाथ से छूट रही है पृथ्वी
सागर के एक कोने में
शाम होने को है
मैं रूठकर कितना भटकूंगा
शब्दों में      

Tuesday, May 17, 2011

आवाज़ बुनने की कारीगरी

कभी बहुत अच्छा लगता तुमसे बातकर
जैसे गुबरैले सुबह का गोबर लिए
निकल जाते हैं कहाँ
मैं नहीं जानता !
कभी ऐसा लगता ,जैसे पूरी सुबह
ओस में भीगकर
धूल की तरह भारी हो गई हो,जो पांव से नहीं चिपकती
दबकर वहीँ रह जाती !
जानने का क्या है ,मैं कुछ भी नहीं जानता
हाँ कुछ चीजें याद रह जाती हैं,
एक सूत्र तलाशती हुई !
मैं कुछ बोल नहीं पाता
रात का अँधेरा मेरी जीभ का स्वाद लेकर
सदी का चाँद बुनता है
जिसे ओढ़कर दादी सोती है ,और लोग
सन्नाटे की तरफ जाते हैं !
आवाज़ बुनने की कारीगरी मुझे नहीं आती,
मेरी आँख भारी रहती है
जिसे मैं स्याही नहीं बना पाता !
ताल के किनारे खड़ी रहती हैं नरकट की फसलें
जो तय नहीं हैं किसके हिस्से में जाएँगी !
हाथ के अभाव में,
अंगूठा लिखता है इतिहास, और
जबान के अभाव में
आंसू
पेड़ों से नाचती हुई पत्तियां गिरती रहती हैं
और दरवाज़े का गोबर खेत तक पहुँचता रहता है !
मैं रोता हूँ, और भटकता हूँ
शब्द से लेकर सत्ता तक
लेकिन मुझे ,कोई अपने पास नहीं रख पाता
तुम भी कहाँ चली गई
बस रात का आखिरी पहर है
जहाँ उजाले के डर से
चौखट लांघता है आधा देश !

Monday, March 21, 2011

मैं अंकुरित हो रहा हूँ

मैं अभी खेत जोतकर
धीरे-धीरे अंकुरित हो रहा हूँ
कुहासे भरी रात के बीच
और तुम,सड़क के उस तरफ लहराती हुई
नदी की तरह बहकर,दूर निकल गई
आसमान की तरह साफ होगी तुम्हारी देंह
जो अभी भी झलकती है,तुम्हारे ही अन्दर
नदी में, टिम-टिम करती हुई !
उसे छूने के लिए मैं बहना नहीं चाहता
क्योंकि छूट गए पीछे,अनगिनत लोग
मैं खेत में अंकुरित हो रहा हूँ,
और मेरे ऊपर औंधे लेटी हुई तुम!
सहलाता है मेरे प्यार को एक किसान
लबालब भरी हुई क्यारियों की तरह,
जिसमे टिमटिमाती है तुम्हारी देह
फिर धरती सोख लेती है उसे
लेकिन मैं बेचैन हो जाता हूँ
कहीं धरती की सतह पर छूट तो नहीं गईं
तुम्हारी देह,तुम्हारी आँखे
क्योंकि मैं अंकुरित हो रहा हूँ
मेरे भीतर से फूटेगा कौन
मेरे भीतर खाली है आत्मा
एक पहाड़ की तरह
जहाँ से हवा गुजराती,मैं खुद को तरासता
लेकिन सीने पर पाल नहीं बाँधी
जिसे तुम सहारा देती,एक नाविक की तरह
आसमान के दुसरे छोर पर बैठी
याकि जिसके सहारे खुद ही उतर पाऊं
तुम्हारे भीतर,इस नदी में
तीरुं उस तरफ
जहाँ गायें चरती हैं ,जहाँ मोर नाचते हैं
जहाँ पतलो के भूए तपती रेत पर बिछे
ऊपर तुम्हारी देह देख रहें हैं
और पहाड़ तुम्हे प्रेम करना चाह रहें हैं
बस उसी तरफ मैं अंकुरित हो रहा हूँ
एक किसान के सहारे,
एक नाविक के सहारे,
एक पहाड़ तरासती हवा के सहारे !

Wednesday, February 9, 2011


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Tuesday, January 11, 2011

ज्वालामुखी के मुहाने पर

गए साल की तरह आने वाले साल में भी....
मृत्यु जीवन पर भारी होगी,
क्योंकि,जीवित हैं अभी दंगों के ब्यापारी
किसानो की आंत अभी गिरवी है साहूकार की दुकान पर,
जिसकी रिहाई की शर्त जिस किताब में दर्ज है उसे रखना अब जुर्म है
और उधर जंगलों में छलनी है धरती का सीना
जिसे हत्यारे अपनी मुट्ठी में कैद रखना चाहते है!
जीवित हैं वे सभी जो मेरे देश को मौत का पिरामिड बनाकर
बिना सुबूत जेल में भर दे रहें हैं
इसी आने वाले समय(साल)में निमंत्रण है आप का,
रखी है चाय की केतली अभी भी
'ज्वालामुखी के मुहाने पर
'

Thursday, January 6, 2011

बसंत आने को है....

दुनिया भर में उठ रहे
तमाम विद्रोहों के बीच
अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाते हुए
हम बैठे हुए हैं विश्वविद्यालय
की सीढियों पर
पोस्टरों के साथ !
जिनकी जबान हम बोल रहे हैं ,
जो चले आये है दुनिया भर में पसरे
लोकतंत्र के रेगिस्तान से !
जिनका कहना है कि
अब वहाँ सिर्फ कैक्टस ही उग सकते हैं
हमारी जगह अब वहाँ बाकी नहीं है !
तो हवाएं बहुत तेज़ हैं,
पत्तियां झड चुकी हैं,
और धूप सीधी आ रही है
लेकिन परछाइयों में कहीं ना कहीं
शाखों का हस्तछेप बरक़रार है
और शाख के हर कोने से
हरा विद्रोह पनप रहा है
कि बसंत आने को है!
ये कैक्टसों की दुनिया को खुलेयाम चुनौती है
कि बसंत आने को है!

Tuesday, December 28, 2010

इस सुबह को गौर से देखो

देखो,
इस सुबह को गौर से देखो !
सूरज उंघते हुए
निकल रहा है कैसे
धरती की कोंख से ,
और रेंग रहा है पहाड़ों पर
आकाश की तरफ !
गौरैया कैसे हसरत भरी नज़रों से
देख रही है आकाश को,
बंद कलियों को गौर से देखो
जो बस अभी मुस्कुराने को है,
आकाश की ओर चलने को आतुर
दूबों की गोंद में खेलती
ओस की बूंदों को देखो !

उठो ,
तुम भी उसी तरह उठो
उठो कि
तुम भी उसी राह के मुसाफिर हो
तुम्हारे तकिये और गाल के बीच में
अभी भी थोड़ी सुबह बाकी है
उठो,उसी तरह उठो

मेरे प्रेम करने से पहले.....

मैं चाहूँगा,
मेरे प्रेम करने से पहले
नदियाँ अनवरत हो जाएँ
और पत्थरों से टकराने का सिलसिला थम जाये !
डूब जाने का डर,
नदियाँ अपने साथ बहा ले जाएँ
और उनकी प्रवाह में डूबा हुआ मेरा पांव
ये महसूस करे,
कि नदियाँ किसी देवता के सर से नहीं
वरन पृथ्वी कि कोंख से निकली हैं !

मैं चाहूँगा नदी के किनारे पर बैठी औरत,
जब सुनाये कहानियां नदियों की
तो त्याग दे देवताओं की महिमा !
वो बताये अपने पुरखों के बारे में
और बताये, कि सबसे पहले हम आकर, यहीं बसे
नदी हमारा पहला प्रेम थी !

मैं चाहूँगा,
मेरे प्रेम करने से पहले
पेड़ पतझड़ के बाद
बसंत की आवग का,दर्शक ना रह जाये
हरेपन के लिए मौसम के खिलाफ
नदी और सूर्य को एक कर दे,
वो महसूस कर ले
घोसलों और झोपड़ियों के पति अपने दायित्व को !

मैं चाहूँगा,
गौरैया और पेड़, जब आपस में बातें करें
तो कहें,वो आँगन जहाँ तुम्हें दाने मिलते हैं
सृष्टी की आदि में मेरी इन्ही भुजाओं पर बसे थे
आज पृथ्वी से इस पर इर्ष्या है मेरी !


मैं चाहूँगा,
मेरे प्रेम करने से पहले
पत्थर ह्रदय की तरह धड़कने लगे !
खोल दे ख़ामोशी की सारी तहें,
जहाँ से कभी नदियाँ गुजरीं
कभी कोमल तो कभी उखड जाने इतने दबाव के साथ!
जहाँ लोग शिकार की तलाश में घंटों टेक लिए रहे !

दिखाएँ वे निशान
जहाँ रगड़कर आग पैदा की गई
और कहें,
मेरी ख़ामोशी का मतलब ये ना लिया जाये कि,
आग देवताओं कि देन है
मुझे ही तराशकर उनको आकार दिया गया
जबकि उनके भीतर
मैं आज भी मौन हूँ !

मैं चाहूँगा,
मेरे प्रेम करने से पहले
गुफाएं, खोल दें सारी गुफा चित्रों का इतिहास
जिसे इस श्रृष्टि के पहले कलाकार ने
अपने ह्रदय की चित्र भाषा में खिला था !
इतने तनाव में कोई पहली बार दिखा था !

उसके आने से पूर्व, कई दावानल आये
और नदियों का रंग लाल रहने लगा ,
तभी इसने छोड़ दिया अपना समूह
कभी वह बर्बर नरभछि लगता ,
कभी असीम सहृदयी ,
लेकिन अंततः ,इस द्वन्द में
भाले और तीर लिए लोगों के मध्य
उसने अंकित किया
एक निहत्था मानव जो चलता ही जा रहा था
कहीं किसी ओर !
मेरे प्रेम करने से पहले........

Monday, November 1, 2010

कुहरा और उदासी


पूरा दिन कुहरे से ढका हैं!
जैसे कुहरा और उदासी,
एक साथ चले हों किसी समय में!
या फिर किसी ने शरारत की होगी,
पूरी सदी के चेहरे पर
कुहरा मल दिया होगा,
और हम पहचानने लगे होंगे उदासी को !
कहने लगे होंगे कि
आज मेरा मन बहुत उदास है!
या कि आज तुम बहुत उदास लग रही हो !
क्या मेरे बारे में भी ये सच है ?
क्योंकि जहाँ से ये भाषा आ रही है,
वहाँ बहुत घना कुहरा है,
जो मेरे अन्दर तक घर कर गया है!
क्योंकि इतनी बेचैनी के बाद भी,
ये भाषा बेचैनी कि नहीं, उदासी कि है!
जबकि मुझे लगता है
उदासी कि भाषा बेचैन होनी चाहिए ,
हरकत से भरी हुई !

Sunday, October 17, 2010

सरयू नदी



मेरा समग्र अकेलापन
सरयू के तीरे
एक पत्थर में कैद है !
जिसकी आजादी की शर्त
सरयू अपने साथ समंदर में बहा ले गई
और मुझे अकेला छोड़ गई !

मैं आज भी वहीँ तीरे पर बैठा हूँ !
सरयू मेरा पांव तुम्हारे सीने मैं है,
फिर भी तुम बहे जा रही हो !
मुझे अपने सीने में लो सरयू
थोड़ी देर रुको ,सुनो सरयू
मैं वही,तुम्हारी रेत का बंजारा हूँ !

सरयू एक बार मेरे सीने में बहो
और तोड़ दो मेरी चुप्पी को !

बिखरें वे शब्द

इन बक्सों में बंद हैं कुछ किताबें !
मैं सोच रहा था,सीढ़ी से नीचे उतरते वक़्त
शायद इसे बिखर जाना चाहिए था ,

बिखर तो इसलिए भी जाना चाहिए था,
कि किताबों के हर पन्ने पर
तुम्हारे चेहरे की भंगिमा
कुछ और भी, लिख और कह गई है!
उन शब्दों से तुमने अपने भीतर भी झाँक लिया था,
जो तुम्हारी आज़ादी के दरवाज़े पर
ताले की तरह लटक रहे थे!

एक बार तो जरुर बिखरें वे शब्द
जिन्हें अंडरलाइन कर
उनकी अनिवार्यता को रेखांकित किया गया है !
ये वही वक़्त है !
एक बार जरुर बिखरें वे भंगिमाएं ,
जो कभी एकांत में
उसके चेहरे से गिर गई होगी !
जिसे ऐसे शब्द ने पाया होगा
जो किसी प्रेमी के ह्रदय से हो के आया होगा !

एक बार जरुर बिखर जाए वो एकांत
जिसे बल्ब की रोशनी में
उसकी परछाइयों ने समेटकर रखा होगा !
और कभी किसी वक़्त की
वो ख़ामोशी भी जरुर बिखरे
जिसमे तुमने अपने वियोग को छुपा रखा है !

जैसे जैसे तुम आगे बढती जाओगी
ये किताबें उतनी ही वापस
धीरे-धीरे पीछे लौटती जाएँगी !
जहाँ स्मृतियाँ चौखट पर चिराग की तरह जल रही होंगी !

तुम्हारा दूर देश में चले जाना
कहीं से यह साबित नहीं करता कि, प्रेम
भूगोल कि किताबों का कोई अनिवार्य अध्याय है!
जहाँ दलहन और अगहन में कोई सम्बन्ध ना हो!

तुम्हारा दूर देश में होना
कहीं से यह साबित नहीं करता कि ,
जब यह पृथ्वी घुमते हुए
सूर्य के सबसे ज्यादा निकट पंहुच जाएगी
तो सूर्य के ताप से घिरा तुम्हारा ह्रदय
अपने प्रेम को समय कि चिंताओं से मुक्त रख़ पायेगा !

हमारा दूर होना ,
कहीं से यह साबित नहीं करता
कि इतिहास जब अपने को
पूरा चक्र दोहरा रहा होगा
तो हम भी उस पल को दोहरा नहीं रहे होंगे !






आखिर मेरा देश मेरे लिए दर्जी क्यों है ?



उसका हर प्रश्न
एक प्रतिरोध की तरह था !
ना वो सड़क पर खड़ी थी,
और ना ही इस देश की संसद के चौराहे पर !
होस्टल के एक छोटे से कमरे में
एक-एक कपडा उतारते हुए
वो सोच रही थी, कि
आखिर इसमें ऐसा क्या है ?
कि मेरे देश का वो हर कोना
जहाँ मैं खड़ी होती हूँ
बाज़ार बन जाता है !
आखिर मेरा देश मेरे लिए दर्जी क्यों है ?
जो मुझे हर तरफ से नाप तौल लेना चाहता है !
जो हर बार नापने तौलने से पहले
मुझे बताता है कि
'आजकल यही चल रहा है'
वो पूछती है कि,
आखिर ये चला कौन रहा है ?
और उसकी नज़र कहाँ है ?

इतने में रसोईघर में
माँ के हाथ से थाली छूट जाती है!
और हांफते हुए बोली,
इस घर में दो ही मूर्तियाँ टंगी हैं
एक सती कि, दूसरे सीता की,
जिसे तेरे पिता मंदिर की
सीढियों से उठा लाये थे !


मैं राख़ होना चाहता हूँ



जिसे तलाश कर रहा हूँ,
वो मेरी परछाइयोंके साथ
इस शाम में घुल रही है !

बच रहीं हैं कुछ टूटी हुई स्मृतियाँ
जहाँ से अजीब सी गंध उठ रही है !
टूटे हुए चश्मे,
मन पर बोझ की तरह लटक रहें हैं !
मेरी पहचान को आईने इनकार कर चुके हैं !

खंडहरों में सुलगती बेचैन सांसें
कबूतरों के साथ
शांति की तलाश में भटक गई हैं!
सातवें आसमान पर बैठने की चाहत को,
सात समंदर पार वाले राजा ने कैद कर लिया है !

लगता है पूरी की पूरी सदी लग जाएगी
सुलगकर आग होने में ,
मैं राख़ होना चाहता हूँ !

सुलगना,
आग होना,
और राख़ होना
दरअसल शाम में तुम्हारे साथ मिल जाना है !
मैंने देखा है
परछाई, शाम और राख़ के रंग को
सब ताप के बाद की तासीर !

Saturday, October 16, 2010

इलाहाबाद



मैंने इस शहर को पहली बार
पानी के आईने में देखा
रेत के बीच
पिघलते हुए लोहे की तरह !
जैसे कुछ लोग बहुत दूर से
किसी ऊँची ढलान से
एक गहरी खाई में दस्तक दे रहें हैं !

एक पाँव पर खड़े होकर
सूर्य की पहली किरण के साथ
अर्घ का लोटा उठाये हुए
पूरी सभ्यता का भार
एक पैर पर लिए, निचोड़कर सूर्य का सारा ताप
मुझे विसर्जित कर दिया इस शहर की
ढलान से तंग गलियों के बीच !

आखिर मैं दंग हूँ
इस गहरी खाई में जहाँ इतने दरबे हैं,
जिसके मुख पर मकड़ियों ने जले बुन रखें हैं ,
हर तिराहे चोराहे पर लाल बत्ती लगा दी गई है!
जिसके जलते ही हम दुबक जाते हैं
चालीस चोरों की तरह !

हमने अपनी हर साँस रोजगार के रिक्क्त स्थानों में भरकर
लिफ़ाफ़े को चिपका दिया है !
उसके ऊपर गाँधी छाप डाक टिकट चिपका दिया है !
हमने अपने हर सपने हर जज्बात को
किताब के हर पन्ने पर अंडरलाइन कर दिया है !
लेकिन उसके भी
धीरे-धीरे पिला पड़ने ,सड़ने के अतिरिक्क्त
और कोई विकल्प सुरक्षित नहीं है !
लेकिन हमारे सपनो की नींव जहाँ पर है
वहीँ पर इतिहास का पहला प्रतिरोध दर्ज है !

लेकिन जब-जब इस दरबे से बाहर निकलने की कोशिश करता हूँ
और सोचता हूँ कि
ये खाई में पड़े हुए लोग
मेरे साथ खड़े होंगे
लेकिन तभी बजता है एक शंख
मंदिर का घड़ियाल
और लोग लेकर खड़े हो जातें हैं
लेकर मेरी अस्थियों का कलस !

शंख और घड़ियाल के बीच
मैं देखता रह जाता हूँ
दरबों में आत्म्हत्त्याओं का सिलसिला
मैं बैठ जाता हूँ और गौर करता हूँ
कि दरअसल,
जिस संस्कृति कि भट्ठी तुम
प्रयाग और कांची में बैठकर सुलगा रहे हो
उसकी आग कहीं और से नहीं
बल्कि मेरे घर के चुल्ल्हे से मिल रही है !

चुप्पी की गुम्बज

ये उल्लू
जो आपकी,हमारी चुप्पी की गुम्बज पर
बैठ गया है !
उसका मुंह पश्चिम की तरफ है
और उसका पिछला हिस्सा
आपके हमारे पेट पर है !
ये जो कुछ भी वहां खाता है
उसकी विष्ठा
आपके हमारे पेट पर गिराता है!

ये जो जनतंत्र ,लोकतंत्र ,प्रजातंत्र की विष्ठा ,
को इसने हमारे पेट में रोपा और ईमान पर थोपा है,
दरअसल इसे उसने वहीँ खाया है
और इसकी विष्ठा को हमारी आत्मा पर गलाया है !

लेकिन कहीं न कहीं कुछ है,
जो इन उल्लुओं ने अपनी कोंख में दबा रखा है,
और ट्रिकल डाउन का कोहराम मचा रखा है !

मैं अक्सर इन्हें खोजता हूँ
लेकिन ये महज संयोग ही नहीं बल्कि साजिश है
कि जब यहाँ दिन होता है
तो वहां रात होती है
और हमारी हर रात लखना डंडा पटकते हुए,
चिल्लाते हुए,चरती गायों और चोरों से
सावधान करता है !
और काका खरखराती फसल के खिलाफ आग से !

बावजूद इसके
अन्न पूजन के दिन जब काका ने
गेहूं के दुद्धी दाने
गुंड और घी मलकर प्रसाद बनाया
और लक्ष्मी के सामने चढ़ाया, तो मैं देखकर दंग था
लक्ष्मी उल्लू पर सवार थी,
उसका मुंह पश्चिम की तरफ था
और काका की जिद थी,
उसका मुंह का पश्चिम की तरफ रहने दे
नहीं तो अपसगुन होगा !

Friday, October 15, 2010

कितने निराश हो तुम !

कितने निराश हो तुम !
सब कुछ जानते हुए
किस घुप्प अँधेरे में जा बैठे हो
खोखला कर देंगे वे तुम्हें
ख़तम कर देंगे वे तुम्हें!
तुम्हारा निराश होना
उनका तुम्हारे अन्दर तक काबिज हो जाना है !
बाहर निकालो इनसे
लड़ो इनसे
जो ये हवाई जहाजों के शोर से
तुम्हारे लिए दहशत गढ़ रहें हैं,
तुम्हारी अपनी दुनियां से काट कर
एक मायावी दुनिया का भ्रम रच रहें हैं
तुम्हारी हड्डियों के सूरमे से
सभ्यता का मुखौटा तैयार कर रहे हैं !

कभी उन पीढ़ियों के बारे में सोचते हो
जो आँख खुलते ही
या तो किसी यातना गृह में में होंगी
या तो किसी भयानक पाशविक मशीन का पुर्जा
ये यातनाएं उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं मिलेंगी
कि उनका खून गर्म या लाल था
बल्कि इसलिए कि
उनकी विकाश की परिभाषा में
उनकी हड्डियों का बुरादा
दो ईंटों के बीच गारे की तरह लगाया जाना है !

लोकतंत्र का आयत और निर्यात
जो तुम्हारे गाल पर तमाचे की तरह किया गया है !
उनके स्थापित होते ही
तुमने अपने बगदाद को घुटते हुए देखा है,
वियतनाम को सुलगते हुए देखा है !

मुझे उम्मीद है कि
बमों की थर्राहट से कांपती
धरती और ह्रदय के पच्छ में
खड़े होगे तुम !

पत्थर और सीमेंट



इन पेड़ों को ,
जकड दिया गया है
पत्थरों और सीमेंटों से
जबकी शर्तें लगीं हैं विकास की
हमारी हर जरुरत का जवाब उनके पास
पत्थर और सीमेंट हैं !
समझ नहीं पा रहा हूँ, मैंने सवाल क्या किया था ?
लेकिन हमारी हर जरूरत पर पत्थर और सीमेंट
जरुर चढ़ा दिया गया !

पत्थर हमारी सभ्यता की सबसे आदिम अवस्था हैं
तो सीमेंट उसी से पैदा की गयी वर्तमान की
लेकिन फर्क कितना है
एक पत्थर को तराश कर हमने पहिया बनाया था
और तोड़ दी, जड़ता की सारी जंजीरें
और तुमने
हमारी हर जरुरत पर बैठे हुए लोगों
तुमने उसे कूटकर सीमेंट बनाया
और चढ़ा दिया हमारी हर जरुरत पर

तो संदेह है हमें
तुम्हारे द्वारा पैदा की जा रही विकाश की हर परिभाषा पर
क्योंकि उसकी कुक्क्षी में
मैं ,मेरी पहचान और मेरी सभ्यता
विस्थापित हो रही है !

Saturday, July 31, 2010

पाती

कैसे पढूं ये पाती
जो लिखी हैं पुरुवा हवाओं पर
ताज़ा और टटके जज्बात
मेरे इस शहर को शहर को बनाने तक
पड़ चुके होंगे पुराने
और मौसम बदल चूका होगा मेरे गाँव का !

सारे आंसू समां गए होंगे
चटकती हुई धरती की दरारों में
खेतों की सींचने में
शब्दों के कल्ले कैसे फूटेंगे
सूखे हुए पपडीदार होंठो पर
ऐसे में पुरुवा हवांए
पेंड़ो की पुंगियों से जमीन पर सरक जायेंगी
छोड़ देंगी तैरकर बटोरना संवेदनाओं को
ऐसे में दादी तुम और तुम
सिर्फ ईश्वर से प्रार्थना कर सकोगी
मैं जहाँ होऊं
सुखी और शांत होऊ!

Friday, July 30, 2010

दादी

मेरी दादी की आँखों पर होता है
मोटा धुंधले शीशों वाला चश्मा
जिसकी कमानी में एक डोर बंधी है
जाती है जो पीछे की ओर
दूसरी कमानी की तरफ
और बाध देती है दादी के पुरे सर को
उसके अन्दर से पुरे घर को देखती हैं दादी की आँखे

कितनी बार कहा इस लड़के से
सूरज नारायण को उगते ही जल दे दिया कर,
अन्न छु लिया कर,
दातून कर लिया कर,
रोज़ एक ही प्लास्टिक मुह में डाल लेता है
फिर थककर कहती कि `जुग जमाना बदल गयल ह`
दादी का चश्मा

मेरी दादी के पास होती है एक छड़ी
ब्रज के बांसों वाली, खोखली नहीं
जिसके सहारे लगा आती हैं
पुरे घर का चक्कर !
देख आती है गैया को
दे आती हैं अपने हिस्से का कुछ भोजन
इसी डंडे के सहारे
जैसे हांक आती हैं आधुनिकता को
दादी कि छड़ी
मेरी दादी के पास होता है एक हुक्का
जिसपे चढ़ती है कुम्हार कि चीलम,
चूल्हे की आग,
बनिए का तम्बाकू,
और हाँ बढई का शिल्प,
घुडघुडा कर जब दादी इसे पीती थी
कितनी उर्जा मिलती थी उनको
दादी का हुक्का
दादी की मृत्तयु पर टिखटी के सिरहाने
हमने लाकर रख दिया था
दादी का चश्मा ,
दादी की छड़ी,
और दादी का हुक्का
और लेजाकर वो सब विसर्जित कर दिया
सरयू में
जिसके सहारे दादी लड़ती थी
बाज़ार और बाजारुपन से !