रेत हो गए लोग ...

रेत हो गए लोग ...
रवि प्रकाश

Saturday, May 21, 2011

सूर्य के हाथ से छूट रही है पृथ्वी

तुम पास बैठकर
कविता की कोई ऐसी पंक्ति गाओ
जहाँ मेरे कवि की आत्मा
निर्वस्त्र होकर
मेरे आँख का पानी मांग रही है
ये कैसा समय है
कि, ये पूरी सुबह
किसी बंजारे के गीत की तरह
धीरे-धीरे मेरी आत्मा को चीर रही है
जिसके रक्त से लाल हो जाता है आसमान
जिसके स्वाद से जवान होता है
हमारे समय का सूरज
और चमकता है माथे पर
जहाँ से टपकी पसीने की एक बूंद
जाती है मेरे नाभी तक
और विषाक्त कर देती है
मेरी समस्त कुंडलनियों को
मैं धीरे-धीरे छूटने लगता हूँ
ऐसे, कि जैसे
सूर्य के हाथ से छूट रही है पृथ्वी
सागर के एक कोने में
शाम होने को है
मैं रूठकर कितना भटकूंगा
शब्दों में      

3 comments:

  1. एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
    सुन्दर शेली सुन्दर भावनाए क्या कहे शब्द नही है तारीफ के लिए .

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  2. बहुत गहन चिंतन..सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  3. kavita bahut achchi h..bhav ek bindu se shuru hota h aur kai chitr kheench lata h,mano kavi kitna kuch vyakt krna chahta h aur ant me keh uth ta h ki shbd ni h

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